फिर आजकल राजनितिक रैलियों का रंग है,
तिरेंगे के रूमाल बन रहे है....
गाड़ियाँ सजाने का काम भी लेते है लोग इससे
अमूमन इन दिनों...!
लाल, केसरिया, तिरंगा, पीला...हर तरह का रंग...
इन्द्रधनुष बन रखे है गाँव...!!!
सदियों से गुलाम लोग चीख चीख गाने लगे है ...
अपने अपने राजाओ की स्तुतिगान ...
भजन गा रहे है
अपने अपने देवताओ के ,
गुलामी को फिर से आवाज मिली है..!
लोकतंत्र ...का महान नाटक अभिनीत होने जा रहा है,
हज़ारो हज़ार की तादाद में आये और कलाकारों का मानवर्धन करे!
लानत है....!
इन सब रंगों में गरीबी दिखी कही?
चार रोटिया तोड़ , किसी झोपड़ी में एक रात गुज़ार
लोग स्विस अकाउंट को और सेकयोर करते है...
हुह ...तुम इन्हें भगवान समझते हो...
ये अपने मंदिर बनाने लगे है...
लानत है!
और लानत है सबसे जयादा उन बापों पर...
जो डाल रहे है अपनी निरीह संतानों को इस अफीम की आदत,
ढाह दिए जाने चाहिए वो कंधे...
जो ले जाते है मासूमो को इन प्रवंचना के तमाशो में.