Wednesday, October 17, 2012


आज फिर आई बहुत,
 ........तुम्हारी याद.
काले बादल मंडराते रहे,
घुमड़ घुमड़ फिर आते,
उफने बहुत यु बरसे नहीं,
साहस गगन का अजमाते रहे..
दिन भर रहे और रहे सारी रात..
आज फिर आई बहुत, 
....... तुम्हारी  याद.
उठी फिर कुछ आंधियां भी ,
बड़े पेड़ कुछ खेत हुए,
भोले भले निर्धन जर्जर 
प्यारे लोगो के घर रेत हुए.
आंधी बादल सब ने मिलकर, खूब किया उत्पात...!
आज फिर आई बहुत
... ... तुम्हारी याद.
उछल उछल एक ही जगह,कूदता रहा,
बंद पिंजरे में बहुत डरता रहा,
की बहुत कोशिश मशक्कत,
और फिर हार हिम्मत..
उलट पिंजरे में लटका रहा गंगाप्रसाद...
आज फिर आई बहुत,
......तुम्हारी याद.
कुछ कभी छलक भी गए,
दो चार बूंद बरस भी गए...
हिले नहीं ,डटे रहे,
जगह अपनी ठहरे रहे...
तेज फिर बड़ी बूंदों वाली,
आई गयी बरसात .
आज फिर आई बहुत
......तुम्हारी याद.

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