मुझसे रूठा खुदा रहा,
औरो का वो बना रहा
मैंने जब भी आतुर आवाज लगायी,
तेरे हिस्से, या उसके हिस्से,
बटा रहा,
दीवारों में छुपा रहा...!
दुनिया ने भयाक्रांत किया,
घबराया, चिल्लाया..
खुदा न जाने क्यों ना आया...
सोने में बांका है, शायद,
रेशम से ढंका है, शायद..
धनवानों की बस्ती में है शायद
बंद तिजोरी में रमा रहा...
शायद रास रचा रहा...!!!
एक खेल रचा रखा है इसने..
सबको अपना बना रखा है इसने....
कोई खिलाफ हो तो जान पे बन आये उसकी...
जुल्म हिटलर सा मचा रखा है इसने...
कभी मेरी भी चले, कोई दिन कोई बात बने...
इसकी दुनिया में ही चुन दू.
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