Wednesday, October 17, 2012


मृत प्राय पड़ा है लखन,
सूरज भी अब है आन पड़ा...
हुनमन आओ, आ भी जाओ...
 है मुझे तुम्हारा अभिमान बड़ा.

अब भी शायद कोई चमत्कार करो,
तुम आओ, सारे दर्द हरो. यह अतुल घाव भरो.
महाप्रयाण यह निश्चय है...!
तुम आओगे? संशय है...!

यह कही झूठा सूर्यास्त  नहीं ?
अर्जुन को बचाने का नया को प्रयास  नहीं?
तुम लीलाधर रहे सदैव....
पर इस अकुलाहट  का ऐसा मुझको अभ्यास नहीं...!
आओ इससे पहले सूर्य उदय हो...
इससे पहले लखन सर्वदा  को पर पथगामी हो जाए...
आओ दर्शन दो,
संजीवनी!!!

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