सोने को पीतल के पानी से नहला,पीतल कर न सकोगे,
पुस्तक की तुम जिल्द बदल, कविता अपनी कर न सकोगे,
है यह भी एहसास मुझे, टूटेगी एक एक पंक्ति तुम्हारे उच्चारण से,
पर इस कविता के भाव है मेरे, इनको तुम हर न सकोगे,.
कविते! तुम अश्रु, तुम स्मित, तुम क्रोध शोक, जीवन मृत्यु...
वरण करो सौभाग्य! दुर्भाग्य मैं! जानता हु, वर न सकोगे.....!!!
कवि भी भीष्म प्रण ले, तुमको न पुकारे राह निहारे,
पर जब आंसू बेकल हो तुमको पुकारे ....
तुम आना...!!!
No comments:
Post a Comment