Wednesday, October 17, 2012


मैं मोम सा पिघल रहा हु,
एक दिवाली की रात चिराग बन जला...
नहीं जलाया गया.
और अभी तक पिघल रहा हु!!
अभी कुछ पहर बचे है...
मौत में
कब्र का सामान समेट लू...
मरे रहना भी ऐसा है जैसा गाँव से शहर आना...!
माँ बाँध रही है,
चना, सत्तू, चूड़ा, पिरिकिया और पकवान
थैला भर देती है....बेटा कभी कभी तो आता है...
और कहा मिलता है परदेश में यह सब.

मैं बाँध रहा हु...
पिघल चुके मोम पे बाँध....
की अभी बाकि है सफ़र में कुछ रोज.
दिया बुझ जाए तो
तुम संभल रखना ये मोम...
अगली दिवाली में....फिर से जलना चिराग
तुम्हारा घर रोशन रहेगा.

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