Wednesday, October 17, 2012


वो आजकल बड़ी लम्बी उदास राते बना रहा है...
इस दोपहर से उस दोपहर तक लम्बी....!
गरीबी हटाओ योजना सी लम्बी...खोखली...
पंचवर्षीय ...शतवर्षीय ...!!!
कुछ भी कर लो ..ख़तम नहीं होती...!
किसान की आस से मेरे खवाब टूटते ही नहीं...!
नये आधार ढूंढ लेता हु...नयी फसल लगाने को...!
साल दर साल, फसल दर फसल टूटता हु....
कटनी...टूटा...उठा..जुड़ा...उत्साहमय....रोपनी...
कटनी ..फिर टूटा....!
हां वो आजकल लम्बी उदास राते बना रहा है...
प्रथम प्रहर...भूख...माँ याद आती है....आंसू...!
दिवितीय....भूख..तुम याद आते हो ....खून, टपका...!
तृतीय प्रहर....भूख....खुद को पाता हु...आह...उबासी..!!
चतुर्थ .......भूख ....चक्र चलता रहेगा..चोले बदल बदल के...!
वो आजकल बड़ी लम्बी उदास राते बना रहा है...!
और इन सब में जब भी आते हो तुम
तो बाढ़ सा!
बखार का बचा धान भी ले जाते हो...!
इसे क्या कहते है?

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