Wednesday, October 17, 2012


यह अंतिम बिछोह  प्रिये,
सोग करू?
जोग करू?
इस राह तेरे, एक मोड़ खड़े ,
मेरे नैन मिले,
कौन जतन अमोघ करू??

कुछ घाव ऐसे भी रह जाते,
न समय भरे, न दवा हरे,
पछुआ की कंपकंप रात में,
रिस रिस कर जो बहा करे...!
या तो सीना बरसों साले,
या फिर अब विद्रोह करू?

तेरे बालों सी कोई एक संझा हो
तू एक पहर साथ तो आ..
नैनो के भोले तेरे दरस न होंगे..
तू एक नजर पास तो आ ...
आँखों को चिर जोत करू....
अनुरोध करू?
प्रिये....सोग करू? जोग करू?
कौन जतन अमोघ करू???

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