Wednesday, October 17, 2012


वो रात को बोलती थी...अक्सर
जैसे बौराए आम से कोयल कूकती है...!
और बात करते खिल खिल जाती थी..
जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!
यकीन मानो उसके पास जादू की पुडिया थी...
और जादू की दुनिया थी...
जहा वो मुझे छोड़ आती थी ....आने वाले कई दिनों के लिए
और कई रातो के लिए.
जैसे माँ देती थी बेहोशी की दवाई ..
बुखार की रातो में ....!
नहीं पर उसने नहीं दी ठंडी पट्टिया...
और शायद जागी भी नहीं कभी सुबह तक...!
फिर भी...
उसकी बातो में कुछ अलग अहसास था...
वो जून की दोपहर में ठन्डे तरबूजे बेचती थी...
और बेचते बेचते खिल खिल जाती थी...
जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

आज फिर आई बहुत,
 ........तुम्हारी याद.
काले बादल मंडराते रहे,
घुमड़ घुमड़ फिर आते,
उफने बहुत यु बरसे नहीं,
साहस गगन का अजमाते रहे..
दिन भर रहे और रहे सारी रात..
आज फिर आई बहुत, 
....... तुम्हारी  याद.
उठी फिर कुछ आंधियां भी ,
बड़े पेड़ कुछ खेत हुए,
भोले भले निर्धन जर्जर 
प्यारे लोगो के घर रेत हुए.
आंधी बादल सब ने मिलकर, खूब किया उत्पात...!
आज फिर आई बहुत
... ... तुम्हारी याद.
उछल उछल एक ही जगह,कूदता रहा,
बंद पिंजरे में बहुत डरता रहा,
की बहुत कोशिश मशक्कत,
और फिर हार हिम्मत..
उलट पिंजरे में लटका रहा गंगाप्रसाद...
आज फिर आई बहुत,
......तुम्हारी याद.
कुछ कभी छलक भी गए,
दो चार बूंद बरस भी गए...
हिले नहीं ,डटे रहे,
जगह अपनी ठहरे रहे...
तेज फिर बड़ी बूंदों वाली,
आई गयी बरसात .
आज फिर आई बहुत
......तुम्हारी याद.

तुम हो कि, तुम्हे सब कुछ याद नहीं आता,
मैं हूँ  कि सब कुछ भूल नहीं पाता.
लोग हैं, कि कहानिया बदस्तूर है ,तुम्हारी मेरी,
ये तेरा दामन, मुझसे  छूट नहीं पाता.
उम्मीद है कि बाकी रहती है आधी अधूरी ही सही,
दिल है कि अच्छे से टूट नहीं पाता.


तुम्हारा जाना यू कचोटता है ,
जैसे कोई कविता खो गयी हो...!!!
वह कविता जो अब याद नहीं,
बस एक धुंधली छाप सी रह गयी हो...!!!
छोटी? बड़ी?
भावुक?प्यार की?
शायद...
प्रसंग भी भूलता है....शायद..
इसीलिए कचोटता है...!!
वह कविता अधूरी,
जो तुमने सुनी अधूरी, मैंने पढ़ी पूरी,
बार बार , कई बार,
इतनी बार की की महत्वहीन हो गयी ...!!!
यका यक खो गयी...

तुम्हारा जाना यू कचोटता है ,
जैसे कोई कविता खो गयी हो...!!!
वह कविता जो किसी ख़ास दिन,
किसी किताब में रह गयी हो,
और अब धुंधली हो गयी हो...
तुम्हारा जाना यू कचोटता है
जैसे कोई कविता खो गयी हो!!!

जोर डाल सोचता हू...
वह क्या था जो बेमिसाल था?
वह जिसका हर शब्द , एक आंसू था....!!
वह कविता जिसमे मैंने अपनी आत्मा निचोड़ लिखी,
वह कविता खो गयी है...!!!

मैंने चुन ली है,
बांस बाड़ी जाने वाली अकेली उदास पगडण्डी,
लौटू, पर शायद देर लगे..!!!

आँगन वाले बड़े कमरे के पुराने पलंग के नीचे,
आलू ओ के साथ ,
पहली साइकिल का पहिया,
खुदा करे तुम्हे मिले...!!!

बदन सुन्न हो रहा है...
बोलने के लिए कुछ शब्द चाहिए...!!!
ऐसा लग रहा है खाली बन्दूक से गोली चला रहा हु....!!!

चुप्पी सर से पाव तक उतरती है....
जैसे बिशुन झा जहर उतार रहा हो....
सुन्न...
बोलने के लिए शब्द चाहिए...!!!
उहापोह है...यह कहू...या फिर वह कहू...
पर यह सब क्यों कहू...?
और फिर कैसे कहू?
बोलने के लिए शब्द तो चाहिए....???

बचपन में एक आम रोपा था...
(आस हर कोई रखता है....)
इस पर कांटे आये है....!

बोलने के लिए कुछ शब्द चाहिए......
एक लम्बी कहानी है.....आम की, बचपन की, कांटो की...आम पे कांटो की....!!
इस लम्बी कहानी के लिए
बहुत सारे शब्द चाहिए...!!
सब सुन्न हो रहा है ....!!!
जहर उतर रहा है?..चढ़ रहा है...?
शब्द चाहिए....!!!

एक उम्र जियूँगा मैं ........
और तुम्हे आबाद होते देखूंगा....!
अब भी आ जाते हो तुम...
आँखों में, यादो की सीढिया लगा...
एक उम्र जियूँगा मैं....
मोतियाबिंद जब आँखों में धुन्धुलाने लगेगा...
मैं तुम्हे और खुश देखूंगा....
मुझे ख़ुशी होगी.....मेरे बिना तुम खुश हो....अपने अलगाव पे उस दिन...
अपनी टेढ़ी पीठ थप थापाऊंगा .......!!!
तब भी चाहूँगा ....
मेरे साए से ही लग सही...तुम साथ चलो...मुझसे अलग...!!!
और शायद मैं तुम्हारे चले जाने के गम में रो सकूँगा ...
एक कतरा भर आंसू...!!!

सोने को पीतल के पानी से नहला,पीतल कर न सकोगे,
पुस्तक की तुम जिल्द बदल, कविता अपनी कर न सकोगे,
है यह भी एहसास मुझे, टूटेगी एक एक पंक्ति तुम्हारे उच्चारण से,
पर इस कविता के भाव है मेरे, इनको तुम हर न सकोगे,.
कविते! तुम अश्रु, तुम स्मित, तुम क्रोध शोक, जीवन मृत्यु...
वरण करो सौभाग्य! दुर्भाग्य मैं! जानता हु, वर न सकोगे.....!!!


कवि भी भीष्म प्रण ले, तुमको न पुकारे राह निहारे,
पर जब आंसू बेकल हो तुमको पुकारे ....
तुम आना...!!!


यह अंतिम बिछोह  प्रिये,
सोग करू?
जोग करू?
इस राह तेरे, एक मोड़ खड़े ,
मेरे नैन मिले,
कौन जतन अमोघ करू??

कुछ घाव ऐसे भी रह जाते,
न समय भरे, न दवा हरे,
पछुआ की कंपकंप रात में,
रिस रिस कर जो बहा करे...!
या तो सीना बरसों साले,
या फिर अब विद्रोह करू?

तेरे बालों सी कोई एक संझा हो
तू एक पहर साथ तो आ..
नैनो के भोले तेरे दरस न होंगे..
तू एक नजर पास तो आ ...
आँखों को चिर जोत करू....
अनुरोध करू?
प्रिये....सोग करू? जोग करू?
कौन जतन अमोघ करू???

मुझसे रूठा खुदा रहा,
औरो का वो बना रहा
मैंने जब भी आतुर आवाज लगायी,
तेरे हिस्से, या उसके हिस्से,
बटा रहा,
दीवारों में छुपा रहा...!

दुनिया ने भयाक्रांत किया,
घबराया, चिल्लाया..
खुदा न जाने क्यों ना आया...
सोने में बांका है, शायद,
रेशम से ढंका है, शायद..
धनवानों की बस्ती में है शायद
बंद तिजोरी में रमा रहा...
शायद रास रचा रहा...!!!

एक खेल रचा रखा है इसने..
सबको अपना बना रखा है इसने....
कोई खिलाफ हो तो जान पे बन आये उसकी...
जुल्म हिटलर सा मचा रखा है इसने...
कभी मेरी भी चले, कोई दिन कोई बात बने...
इसकी दुनिया में ही चुन दू.

तेरे बाद हम जियेंगे एक उम्र...!
मरेंगे हजारो दफा...!!!
कई खुशनुमा सुबहेंउदास शामसी ढलेंगी अक्सर....
बहुत रंग बदलेगी आबोहवा ..!!
कोई खूबसूरत नाख़ून,
कोई करीने से सजाई चोटी...?
तेरी याद कौन रूप में, किस ढंग में आयगी?
किसको पता ?
मेरे दिल में अक्सर खून उबलेगा...महीनो में कभी , बरसो में कभी, और दिन ब दिन कभी ...
यु ही सही...!
तुमने बड़े नाजुक से मोड़ पे छोड़ा,
भूल जाये...!
याद आएगी तेरी छोटी सी वफ़ा...!!!

कभी यो भी चाहता है दिल, मर ही न जाए क्यों?
तू नही तो फिर जिंदगी पे इतने जुल्म ढाये क्यों?
सब आओ तमाशा देखो, मेरा संसार लुटता है,
हम अब अपना घर बचाए तो बचाएं क्यों?
हद तो ये है, की तुम भी नहीं हो, दुनिया भी नहीं है...
हम है, और हम है, तो बस हम ही रह जाए क्यों?


वो आजकल बड़ी लम्बी उदास राते बना रहा है...
इस दोपहर से उस दोपहर तक लम्बी....!
गरीबी हटाओ योजना सी लम्बी...खोखली...
पंचवर्षीय ...शतवर्षीय ...!!!
कुछ भी कर लो ..ख़तम नहीं होती...!
किसान की आस से मेरे खवाब टूटते ही नहीं...!
नये आधार ढूंढ लेता हु...नयी फसल लगाने को...!
साल दर साल, फसल दर फसल टूटता हु....
कटनी...टूटा...उठा..जुड़ा...उत्साहमय....रोपनी...
कटनी ..फिर टूटा....!
हां वो आजकल लम्बी उदास राते बना रहा है...
प्रथम प्रहर...भूख...माँ याद आती है....आंसू...!
दिवितीय....भूख..तुम याद आते हो ....खून, टपका...!
तृतीय प्रहर....भूख....खुद को पाता हु...आह...उबासी..!!
चतुर्थ .......भूख ....चक्र चलता रहेगा..चोले बदल बदल के...!
वो आजकल बड़ी लम्बी उदास राते बना रहा है...!
और इन सब में जब भी आते हो तुम
तो बाढ़ सा!
बखार का बचा धान भी ले जाते हो...!
इसे क्या कहते है?

तेरी याद भी मुझसे  चुरा ले न दुनिया,
तेरे बाद, मुझे भी किसी का बना दे न दुनिया,
सफ़र लम्बा है बहुत अकेला हु मैं,
मुझे भी किसी के साथ लगा दे न दुनिया.
कोई खूबसूरत बदन, कोई सोने का तन,
लोभ के जाल है इनके, कही फंसा ले न दुनिया.
कभी कभी और भी कोई आता है खवाब में,
तू मेरी याद में रह, मुझे बहला ले न दुनिया..!

मुझे तुम्हारे भगवान होने पर
संवेदना है तुमसे,
कि तुम इतने कमजोर हो..!
हर बार तुम्हारे अंधे भक्त, तुम्हे बचाते रहते है काफिरों से...!
तुम्हे तालो में बंद देख मुझे अफ़सोस होता है,
और ख़ुशी भी कि मैं कम से कम भगवान् नहीं...
चिरियाघर में बंद जानवरों सा
मैं कौतूहल का विषय नहीं...!
तुम्हारे नाम के चमत्कारों का झूठा इतिहास जहा से भी शुरू होता है,
मैं तह तक जाना चाहता हु,
और पढना चाहता हु
पहला पन्ना, जहा से तुमने रचा यह खेल...
झूठ का, खुद को पूजे जाने का प्रपंच.

मृत प्राय पड़ा है लखन,
सूरज भी अब है आन पड़ा...
हुनमन आओ, आ भी जाओ...
 है मुझे तुम्हारा अभिमान बड़ा.

अब भी शायद कोई चमत्कार करो,
तुम आओ, सारे दर्द हरो. यह अतुल घाव भरो.
महाप्रयाण यह निश्चय है...!
तुम आओगे? संशय है...!

यह कही झूठा सूर्यास्त  नहीं ?
अर्जुन को बचाने का नया को प्रयास  नहीं?
तुम लीलाधर रहे सदैव....
पर इस अकुलाहट  का ऐसा मुझको अभ्यास नहीं...!
आओ इससे पहले सूर्य उदय हो...
इससे पहले लखन सर्वदा  को पर पथगामी हो जाए...
आओ दर्शन दो,
संजीवनी!!!

सोचता हु
तुम एकदम पराये हो जाने वाले दिन क्या करोगी?
तुम शायद सजोगी, सजना हमेशा ही अच्छा लगता रहा है तुम्हे....!
तुम काली रात में दिए की जोत सा सजोगी...!
पर याद का कोई झोका तुम्हारे अस्तित्व को हिला तो  नहीं जाएगा ?
अगर हां तो ...टांग देना अपनी चौखट पे नीम के फूल ...
इस बार मैं सन्देश सही पढूंगा....!!!
मेरे, तुम्हारे सपनो के मरण प्रमाण पत्र देखे मैंने...
और दस्तावेज पे तुम्हारे हस्ताक्षर भी...
तुम्हारा नाम अभी भी उतना ही खूबसूरत है...तुम्हारे कोमल होटो सा...!

एकदम परवसना होने से पहले तुम निहारोगी ....
देर तक आइना....!
तुम्हारे एकदम चले जाने के बाद...
 मैंने सोचा है .................................
करूँगा आन्दोलन, फूलो के हित में...
देवताओ के खिलाफ, और उन सब के खिलाफ जो तोड़ते है उन्हें...
कि फूल जिन्दा रहे , बाग़ में, जीवन का उद्देश्य जिन्दा रहे, बाग़ में.

मैं मोम सा पिघल रहा हु,
एक दिवाली की रात चिराग बन जला...
नहीं जलाया गया.
और अभी तक पिघल रहा हु!!
अभी कुछ पहर बचे है...
मौत में
कब्र का सामान समेट लू...
मरे रहना भी ऐसा है जैसा गाँव से शहर आना...!
माँ बाँध रही है,
चना, सत्तू, चूड़ा, पिरिकिया और पकवान
थैला भर देती है....बेटा कभी कभी तो आता है...
और कहा मिलता है परदेश में यह सब.

मैं बाँध रहा हु...
पिघल चुके मोम पे बाँध....
की अभी बाकि है सफ़र में कुछ रोज.
दिया बुझ जाए तो
तुम संभल रखना ये मोम...
अगली दिवाली में....फिर से जलना चिराग
तुम्हारा घर रोशन रहेगा.

दिल की अंगीठी पे ...
तुम्हारी यादो की चाय खौलती रही...!!!
दिन भर!
सुबह के सच हो जाने वाले खवाब में
आई तुम ....
बखौनी सा....गाते बजाते...!!!
यादो की वो किताब ..जिसका हर हरफ एक तस्वीर है...
हर तस्वीर एक कहानी...
पढता रहा....
कहानिया दुहराई....
तुम्हे जिया...!!
पर हर सुबह के सपने सच नहीं होते...!!!

तुम्हारे बाद...


तुमको सारा जहा बना लिया था,
तेरे बाद तनहा न होते तो क्या होते?

इश्क एक पाकीज़ा चीज़ है लेकिन,
एक हसीं चेहरा ना होते, तो यही क्या होते?

इस रास्ते हम  चलते थोडा और साथ साथ,
तुम जुदा न होते, तो हम क्या होते?

मेरे चारशु रहते है आप, चलते फिरते,
आप इंसा  न होते तो आइना होते...!!!

चलो दिल्ली !!!


जब संसद  एक रात बनी,
चोरो ने एक बात कही-
चलो दिल्ली..!!!
सबने मिलकर षड़यंत्र रचा,
चक्रव्यूह सा "  " तंत्र रचा,
फंसी मछली...!!!
चलो दिल्ली..!
निकलते खादी की खाल में,
मिलते प्रजा से पांच साल में,
करते रैली ...!
चलो दिल्ली !!!

Tuesday, October 16, 2012

मेरा रकीब तेरा फैसला लेकर आया,
अपने लफ्जो में तेरा जहर लेकर आया,
एक पल को तो कह ही दिया तुम्हे आवारा,
फिर आँखों में तेरा चेहरा उभर कर आया...
उसकी फितरत में धोखा है बावरे,
आज नहीं तो कल तेरा नंबर आया...!
कौन जीता है किसी झूठ के आँचल में?
तेरे दर से उठा तो खुद को बेहतर पाया.


उसकी नफ़रत से भी हैरान हु,
उसके प्यार से भी हैरान था.
कभी खुदा लगा,कभी शैतान...
वो भी क्या इंसान था?
अब के इंतज़ार में भोर न करो,
वो न लौटेगा, वो तो मेहमान था.
उसने की भूल, तुम तो न करते,
वो भोला था,तू तो सयान था?
अब तो समझो, निकलो इस भवर से,
वो मुहब्बत न थी,वो इम्तेहान था.

Monday, October 15, 2012

दर्द सुनता भी नहीं मेरा,बौखलाता है,
प्यार करना उसे कहा आता है?
कल राह  से उठा गले में पिरो लिया,
आज पूछते है, तेरा मेरा क्या नाता है?
हम टूटते, बिखरते न तो फिर क्या करते?
हम प्यार करते है,हमें खेलना कहा आता है?
अबके नकेल डालनी ही होगी दिल को हमें,
दिल दगाबाज है,बस बरगलाता है.

Sunday, October 14, 2012

कभी इतना गिरा नहीं,जितना तेरे इश्क ने गिरा दिया,
यो तो खुदा था मैं,तुने पत्थर मारे,शैतान बना दिया.
अबकी कभी मिले भी तो,नज़रे न मिलेंगी,
हमने खुद को एक दुसरे से कुछ ऐसा जुदा किया.


कोई लम्हा ऐसा नहीं गुजरता,
जब दिल में तू नहीं धडकता,
आँखों में चस्पा है यादें ऐसे,
रात कटती नहीं, दिन नहीं बीतता.
लोग मिलते है बिछड़ते है,
पर तू  कभी होता नहीं जुदा.


दिल चल फिर जोर आजमाते है,
जमाने को हम मुहब्बत सिखाते है!
नफा नुक्सान न सोच,इश्क का सौदा है,
नुकसान से तो बुजदिल घबराते है!
हम गिर चुके बहुत रंजिशे मुहब्बत में,
आ एक दुसरे को उठते उठाते है...

Friday, October 12, 2012

आज आओ, रोने को बहुत दिल चाहता है,
बहुत सह चूका, नन्हा सा दिल अब टूटता है.
कोई बाँट ले दर्द शायद, अँधेरी रात में,
ढूँढता है, क्या कही कोई जागता है....?

बहुत अकल्मन्द हो दुनियावालो, जानते हो बनाना, मिटाना!
क्या कोई जानता है?हुनर ए भूल जाना?
इतनी रात गए, आँखे जाने क्यों जगती रहती है?
कर सको तो इतना करो, मेरी नींदे ढूंढ लाना!
कभी इस डाल, कभी उस डाल, पाला बदले दगाबाज दिल,
संग हर किसी के होता है, या मुझमे ही है कुछ फलसफाना?
कोई समझाए इस बावरे दिल को मेरे किसी तरह,
ये जाल है उसका,सब टोटका है, रोना, मुस्कुराना!

Tuesday, October 9, 2012

पेंडुलम के लिए.....!


इतना कब तुम पास हुए?और फिर इतनी कब दूर हुए?
एक पल जीना भारी लगता है, हम इतना कब मजबूर हुए?
बस बात बदलने सा था आपकी खातिर इश्क का फैसला लेना,
मेरी जानिब? हम चूर हुए फिर चूर हुए और चूर हुए.
जग से छुपाते फिरते रहे , ताकि तुम्हारा मान रहे, 
जितना तुमको लाड दिया, उतना तुम मगरूर हुए.



पेंडुलम के लिए.....!

सब कुछ तुमने क्या स्वांग रचा?
क्या सचमुच झूठा था अनुराग प्रिये?
माँ की  ममता सी थी तुम कोमल, निश्छल!!!
इतना कैसे अभिसार प्रिये? 
नारी केवल श्रद्धा है?
कैसे कर करू विश्वास प्रिये?
मेरी हर सुबह तुम्हारी होती है,
तुम भी जागी हो कोई रात प्रिये?

पेंडुलम के लिए.......एक और ...

यो तो कभी तुम्हारा बुरा भी सोचता है,
दिल, तुम्हे अक्सर खुदा भी सोचता है,
जो तुमने किया वो पैमाना है धोखेबाजी का,
नादां फिर भी बस तेरा सोचता है.
दर्द जिसने दिया उसी से समझने की उमीदे,
बावरा जाने क्या क्या सोचता है....
कोई रात जागता है आधी, तुम्हे पाता है हरशु
खवाब देखता है, और खवाब को सच सोचता है...!

पेंडुलम के लिए.....पेंडुलम के नाम...!

जब इश्क दर्द दे बहुत तो उसको बुरा सोचना,
खुद से इश्क करना,बस खुद का सोचना.
वो यकीनन बुरा नहीं था,कुछ भी धोखा नहीं था,
पर जिसने ऐसे छोड़ा, उसको क्यों अपना सोचना?
खुद में यकीन रखना, गर जीतना हो जग तो,
अच्छा होता है कभी कभी खुद को खुदा सोचना!
वो लौट आये यकायक तो लिपट मत जाना,
अबकी धोखे को बस धोखा सोचना.