Saturday, December 17, 2011

उपरान्त

वो अक्सर ही खेलता था मुझसे खुदा की तरह ,
पर उस शाम मैं डरा तो, उसने सीने से लगा लिया...!!!

अब जिस शख्स से मिलता हु,डरता हु, शक करता हु,
क्या करू उसका मैंने भरोसा बहुत किया...!!!

तुमने चाहा कि मुझे चोट न लगे, तुम न जानो
तुम्हारी इस चाह ने हमारा कितना बुरा किया...!!!


मैं तो हर पल जान देने की बात करता था,
मुहब्बत साबित करने को उसने एक उम्र जीने का वास्ता दिया...!!!

Saturday, October 15, 2011

तुम्हारा जाना यू कचोटता है ,
जैसे कोई कविता खो गयी हो...!!!
वह कविता जो अब याद नहीं,
बस एक धुंधली छाप सी रह गयी हो...!!!
छोटी? बड़ी?
भावुक?प्यार की?
शायद...
प्रसंग भी भूलता है....शायद..
इसीलिए कचोटता है...!!
वह कविता अधूरी,
जो तुमने सुनी अधूरी, मैंने पढ़ी पूरी,
बार बार , कई बार,
इतनी बार की की महत्वहीन हो गयी ...!!!
यका यक खो गयी...

तुम्हारा जाना यू कचोटता है ,
जैसे कोई कविता खो गयी हो...!!!
वह कविता जो किसी ख़ास दिन,
किसी किताब में रह गयी हो,
और अब धुंधली हो गयी हो...
तुम्हारा जाना यू कचोटता है
जैसे कोई कविता खो गयी हो!!!

जोर डाल सोचता हू...
वह क्या था जो बेमिसाल था?
वह जिसका हर शब्द , एक आंसू था....!!
वह कविता जिसमे मैंने अपनी आत्मा निचोड़ लिखी,
वह कविता खो गयी है...!!!

Wednesday, September 7, 2011

मुझे बचाओ....!!!

चलो दूर चलते है,
ऐसी जगह,जहा बम न फटे!

चलो दूर चलते है,
ऐसी जगह, जहा कम से कम बम फटने का डर न हो!

चलो दूर चलते है,
ऐसी जगह , जहा अगर बम फट भी जाए
तो कोई रेणुका गैर बयानी न करे,
और हाँ देखना, वहा कोई अब्दुल्ला न हो...!

मुझे बम फटने से ज्यादा परेशानी,
किसी के अब्दुल्ला या रेणुका बनने से होती है...!
चलो दूर चलते है,
इस रेणुका रानी से, फ़िज़ूल बयानी से...!!

चलो दूर चलते है,
ऐसी जगह जहा क़त्ल मजहब न हो किसी का,
चलो दूर चलते है
जहा कुछ मोल हो जिंदगी का!!!

पर देखना घुसपैठ न हो....
मजहबी भेड़िये ना आ जाए....
पर ठीक है अगर आतंकवादी आ भी जाए ,
रेणुका और अब्दुल्ला ना आये...!!!
नहीं तो हम कही और चलेंगे...फिर कही दूर...!!!

आधी रात के जागते स्वप्न

सोचा, कुछ ऐसा मेरे संग हो जाए,
कि तू मुझसे मिलने आये.
या फिर तुझपे ही कुछ ऐसी बीत जाए,
कि तू बस मुझसे, मिलने आये...!!!
तेरी दुनिया में तेरा तेरे जैसा न रहे,
या फिर मेरी कोई दुनिया न रहे,
पर कुछ ऐसा 'न' रहे कि
भूल सब कुछ, तू मुझसे मिलने आये..!!

Sunday, August 14, 2011

झूठी बातें

आओ फिर मुझसे झूठी बातें कर लो,
इससे पहले की ये सांझ ढले,
नभ पर जाकर तू चाँद बने,
साँसों में मेरी पल भर पल लो,
आओ फिर झूठी बातें कर लो...!
फिर से कोई अभिसार करो,
थोडा, तुम व्यापार करो ..
एक मीठी बात कहो..
मेरा सब गिरवी रख लो...
आओ फिर मुझसे झूठी बातें कर लो.
कुछ थोथे बोल कहो,
जीने की आस तो दो,
ना आना ना आना,
पर आने का विश्वास तो दो..!!
आँखों से उम्मीदों के आंसू हर लो..
आओ मुझसे झूठी बातें कर लो...!!!

Friday, July 22, 2011

तुम हो कि, तुम्हे सब कुछ याद नहीं आता,

मैं हूँ कि सब कुछ भूल नहीं पाता.

लोग हैं, कि कहानिया बदस्तूर है ,तुम्हारी मेरी,

ये तेरा दामन, मुझसे छूट नहीं पाता.

उम्मीद है कि बाकी रहती है आधी अधूरी ही सही,

दिल है कि अच्छे से टूट नहीं पाता.

मेरे आँखों के चराग में तेल है खवाब तेरे


Monday, July 4, 2011

आवारा...!

वो आखिरी पुल भी ढह गया, कल रात देखा खवाब में,
वो अजीब तुम्हारा बाग़ था, सिर्फ कांटे आये गुलाब में!!


तुम न होगे तो तेरे साये से लिपट के रो लेंगे,

कैसे भी कर के ए बेगाने,हम तेरे हो लेंगे .!!

Tuesday, May 31, 2011

मैं छोड़ता हु यह संघर्ष..
नहीं घुटने नहीं टेक रहा
पर तुम्हारी इस दुनिया में ..
जहा तुम धरम के नाम पर क्या क्या नही बेचते हो...
और जाति के नाम पे क्या क्या कचरते हो...
तुम्हरी उस दुनिया में तुम्हारी ही दी धरती पर से
मैं संघर्ष नहीं करना चाहता..और
घुटने टेकने के लिए भी तुम्हरी जमीन गवारा नहीं मुझे.
मैं चलता हु...
मुझे थोड़ी सी अपनी जमीन चाहिए थी....
पैर रखने को..और थोड़ी आसमान सर के ऊपर..
जमीन और आसमान जिन्हें मैं अपना कह सकू..
मुझे रोटी चाहिए...जीने का संबल चाहिए...
तुम उपदेश मत दो..की जीने के लिए सही रास्ते अपनाऊ...
मुझे मरने तक का सही ढंग नहीं दे रहे सब
और जीने के सही रास्ते दिखलाते हो जब मुझे रोटी चाहिए...??
मुझे नहीं लड़ना तुम्हरी इस दुनिया में...!
तुम्हारे हर कदम में सियासत की बू आती है...
और मुझे तुम्हारे इस पूरे आडम्बर से घिन है....
तुम्हारे घिस चुके वादों की पोटली जलाकर सोचता हु ताप लू...
कडकडाती रात में हडियो को एक सहारा तो होगा...
हाँ पर मेरी ताबूत में आखिरी कील मारने से पहले ये सुन लो...
जिस दिन मुझे मेरी जमीन मिल गयी
और मैं लड़ने निकल पड़ा...सुनो तुम्हारा पूरा ढोल बिखेर दूंगा...
मुझे इन्तेज्ज़र है अपनी जमीन का.

Monday, May 30, 2011

आज फिर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है,
कि आज फिर आंसुओं ने कर दी है हड़ताल...
सहस ही बन उठे है तूफ़ान ...
मैं जानता हु कि हमारे बीच दूरियाँ
सागार सा हैं, अपरिमित, अनंत..
और यह भी नहीं पता कि उस पार तुम हो भी या नहीं..


लेकिन इस ज्वार का क्या?
मुझसे ही करता रहता है विद्रोह...!!!
तनिक,
दम लेते ही टूट पड़ता है महिशाशुरी आक्रोश के साथ...


मैं भूल नहीं पाया अभी तक
एक दिन जो तुम्हारे आँखों ने मुस्कुरा कुछ पूछा था
और मैं जमीन में ढूंढ रहा था कुछ, यु ही,
मैं कंकर पत्थर चुन रहा था
अतीत अब भी घाव सा उभरता है...
और हाँ दुखता भी है....
कुछ दोहरा सकते हम...एक बार फिर से!!!
तुम मुझे चाह नहीं सकते
हम तुम पा नहीं सकते मगर
एक बार फिर से दोहराते हैं
सब कुछ,तुन्हारे होटों कि खिचती हुयी रेखाएं,
मेरा झुकता हुआ सर,
और इधर उधर होती हुयी नजरे
सब कुछ दोहराते हैं...
कि मैं नहीं चाहता कि आंसुओ को विद्रोह करना पड़े
मैं लौटना छठा हु उन अकेली रातों में...
जिन में किसी गन्धर्व कन्या सा गाते रहते थे
मेरे खामोश आंसू...
तुम आओ तोह सही सागर के उस पार से....
उसकी चाहत की अजीब रस्मे तो देख
मुझे भी न देख,उसे भी न देख,

मुझे चाहना उसके बस का नहीं,कहती है
मेरी बातों में प्यार की मौशिकी न देख

वो मेरे रकीबो से मिलती है सज धज कर,
कहती है इसमें तू कोई आवारगी न देख.

मैं उसका ना रहा तो उसके दुआओं ने सदा दी,
तू मेरा हो के मर जा,कोई और जिंदगी न देख.

Saturday, May 28, 2011

काश तुम अपनी भरी दुनिया में से मुझे कुछ दे पाते...

बदला ही सही..

मैं ?मेरी तो दुनिया ही तुम्हरी है...!

काश की तुम दे पाते मुझे एक एहसास जो कभी मैंने किया नहीं...

और जिसे मैंने कभी जिया नहीं...!

अभी नीम की पत्तिया झड चुकी है...

और उन पर आ गए है सफ़ेद सफ़ेद छोटे छोटे फूलो के गुछे...

पर ठीक इसी वक़्त ऐसा क्यों है कि..

लाल फूलो वाला पेड़ उदास है...

कोई पत्ता तक नहीं!!!!!!!

काश कि तुम उसे कुछ पत्ते दे देते...!

पत्ते जो इस मौसम में उसे हमेशा छोड़ देते है...

तुम मेरी कविताएं नहीं समझ पाओगे...

मैं खुद भी नहीं समझ नहीं पाता...

काश कि तुम उन बच्चो को दे पाते कुछ साहस और कुछ सम्मान...

जिन्हें मैंने कल भी डांटकर भगा दिया...

जब वो रोती सूरत लेकर मुझे दुआ दे रहे थे..

मैं क्या दू? मेरी तो सारी दुनिया ही तुम्हारी है...!!!

मैंने उनको दिए सपने...उनको थोथापण लगा...!

काश कि तुम तैरना जानते...या कि मेरी होती टाँगे...

और हम दो किनारे न होते...!

एक धार होते ....

हिमालय से लेकर सिन्धु तक बहने वाली

एक धार.

ऐसे आती है तुम्हारी याद..

जैसे बीहड़ में कोई ब्र्हम्दाकिनी जलाती है ...

आग ....!

और कोई सुरजा या पेटला देख लेता है...

और किस्से होते है हर गाँव...

ब्रह्म्दाकिनी के और यह भी की...

सुरजा कितना झूठ बोलता है...

और पेटला कैसे पिछली गर्मी में मिर्गी खाता रहता था.

मैं किसी बच्चे सा

सुनता रहता हु...

और तुम्हारी याद ब्रह्मदाकिनी की डर सा चिपकी रहती है मेरे साथ...

हर जगह हर वक़्त..!

कई बार इन रास्तो से गुजरते हुए मोड़ के पत्थर बोलते है...

तुम्हारा नाम.

और भी, कोई कहानी..!

मेरे सामने दूर तक हरे पेड़ है...

पीपल के नीम के...आम के और ना जाने किस किसके

चिड़िया पूछ घुमा घुमा के फुदक रही है...

मानो जानना चाहती हो की पूछ है की नहीं...

देखना चाहती हो...पूछ का अश्तित्व ....!

अस्तित्व की जांच एक बेहद कठिन प्रक्रिया है...

और यह जांचना की आप हो और आप ही हो और भी कठिन.

हर बेढंग चीज़ के तरह नज़र इस सूखे पेड़ पे अटकी पड़ी है...

जैसे भूखे की निगाह रोटियों पे..............!

गौर तलब यह भी है की रोटी भी बेढंगी चीज़ है...

पर यह मामला बहस का है और विचारधारा का है....

हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं.....

मुझे तो वास्ता इस सूखे पेड़ से है....और फुदकती चिड़िया से है...!

सोचता हु एक ऐसी जगह चुनु जहा इस सूखे पेड़ की चुप हो...

हरियाली का अभिसार न हो....

चुप हो सूखे पेड़ का हो....

हाँ पर चिड़िया हो ..फुदकती हुयी...

क्युकी अस्तित्व की जांच बहुत जरूरी है...

आप हो और आप ही हो...यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है.

सुनो

बहाने दो मुझे आंसू,

आत्मा को पवित्र करती है ये निर्मल अश्रुधारा,

और हाँ जिस दिन मेरे आंसू रुक जाएँ

समझ लेना की मेरे भीतर का इंसान मर गया,

मेरे अन्दर इंसानियत ख़तम हो चुकी...

सुनो

उस दिन के बाद

मुझसे इंसानों सा मिलना..

वज़ह?एक जानवर को इंसान ही संभाल सकता है...

किन्तु एक सश्य है...

कि तुम्हारे अन्दर का इंसान तो कब मर चुका!

निश्चय ही

हम और तुम आमने सामने होगे...

उस दिन जिस दिन मेरे आंसू रुक जायेंगे..

सुनो.

टूटे हुए खवाब के शोशे यूँ चुभते है...

जैसे किसी पुराने गहरे घाव का निशाँ दिखाई देता है...

और एक धुंधली सी कहानी उभरती है.

धुंधले नाम, धुंधले चेहरे और धुंधली स्मृतियाँ..!

बारहा आँखों में आंसू बन उतर आता है,

वो बरसाती नदी सा यकायक चढ़ आता है

यु तो चुप रहता है,जहा रहता है,दिल में,

जब आता है तो ,बादल सा,घुमड़ घुमड़ आता है,

यह जो अभी उबल आया,

पार हीराकुंड के निकल आया,

क्षण भर पहले कहा था?

बस धुआं था.

तुम जो बरसाती चाँदनी,

फूल पर, बाग़ पर,

सुर्ख लाल गुलाब पर,

क्या तुम्हारा अनुराग था?

चाँद में दाग था...!

टिमटिमाता रहा दिया,रात भर,

एक तुम्हारे आने की आस भर,

किसने सूरज जला दिया?

तुमने दिया भुला दिया.

अश्क कभी छुपा न सको,

गर मुझे भुला न सको,

बस इनती सी बात भर?

लौट आना मोड़ पर.

Monday, May 16, 2011

वो रात को बोलती थी...अक्सर

जैसे बौराए आम से कोयल कूकती है...!

और बात करते खिल खिल जाती थी..

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

यकीन मानो उसके पास जादू की पुडिया थी...

और जादू की दुनिया थी...

जहा वो मुझे छोड़ आती थी ....आने वाले कई दिनों के लिए

और कई रातो के लिए.

जैसे माँ देती थी बेहोशी की दवाई ..

बुखार की रातो में ....!

नहीं पर उसने नहीं दी ठंडी पट्टिया...

और शायद जागी भी नहीं कभी सुबह तक...!

फिर भी...

उसकी बातो में कुछ अलग अहसास था...

वो जून की दोपहर में ठन्डे तरबूजे बेचती थी...

और बेचते बेचते खिल खिल जाती थी...

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

Tuesday, March 15, 2011

सूनी आँखे बोलती है...

रातें महाजन के उधार सी हो गयी है ...

चुकती ही नही,

नींदें बांस के फूल सी..

निठुरवा लौटता ही नहीं.

किस बिदेस हो तुम???

नहीं ली इस बार नयी चूड़ियाँ...

खन खन बोलता रहता था .

लड़ बैठी हू, रूठी पड़ी हू...

निठुरवा मनाता भी नहीं.

मुझसे ऐसा परहेज!!!

निठुरवा टुकुर टुकुर ताकता रहता है,

मुंडेर से,

खिड़की से(जिअसे पहली बार देखा था)

मोढ़े पे बैठा कनखी से...

निठुरवा पर बोलता नहीं...

ऐसा चुप ऐसा चुप...

निठुरवा बोलता क्यों नहीं?

निठुरवा हवा के झोके सा आता है,

ठीक उसी वक़्त ...

जब पीपल के सारे पत्ते चुप होते है..

ठीक उसी वक़्त

जब उख के खेत में ,

स्यार हुआ हुआ चिल्लाते है..

पापी, निर्मोही..!

निठुरवा कुए से बाल्टी भर भर

बासी यादें निकालता है..

रे नुनु ...

बडकी सयान हो गयी है..

गैया बूढी ...

निठुरवा लौटता क्यों नही ?

ये कैसा बिदेस ?

मुझसे कैसा परहेज?

कल रात बहुत बारिश हुयी...तूफ़ान सा था कुछ

खेतो की फसल

...ओलों से लहुलुहान हो गयी है

और मेरी आँखों में एक उम्मीद बची है की शायद अब भी कुछ उपज जाए...

काश की तूफ़ान ने उम्मीद भी तोड़ दी होती

अनाज से भरे बखार का स्वप्न तिरोहित हो गया है

मेरे छुप छुप पलते खिलखिलाते सपनो को

बारिश की एक रात लील सी जा रही है

पर ये नामुराद उम्मीद फिर भी लौट लौटआती है

शायद इस फसल को काटने के लिए दिहारी मजदूर तक ना आये

मैं जानता हु नहीं आयेंगे

इस जनाजे को मुझे ही उठाना है...निपट अकेले

पर ये सब कुछ लुट जाने में भी कुछ की उम्मीद क्यों बाकी है?

...काश की तूफ़ान ने "कुछ" भी तोड़ दिया होता

सब कुछ के साथ.

Monday, January 24, 2011

रकीब के नाम प्रार्थना पत्र....!!!


महोदय...
विषय यह है...
समष्य जटिल है...!
मेरे दुलार ने, मनुहार ने,,
ढलती सान्झो में बार बार मेरी
पुकार ने...,
मेरे......................!
हमारे.....!
ओह ....
तुम्हारे...
प्यार का और मेरे संसार का...
तन कोमल और मन चंचल कर दिया है...!
संभालना...!

Sunday, January 23, 2011

आज फिर महसूस हुआ की
तुम्हे खो दिया है...!
नसों में खून जमने लगा है...
की तुम्हे खो दिया है...!!!
चेतना भावनाओ के चक्रवात में
अदृश्य हो गयी है...
तुम्हारे चहरे का उड़ा रंग,
कही किसी के माथे पे दर्प बन चमक रहा है
.................................................!!!!
और लगा की तुम्हे खो दिया है...............!!!
उतेज़ना के शीर्ष से,
शिथिलता के पाताल तक ....
अचेतन, मन रो दिया है....
आज फिर महसूस हुआ , तुम्हे खो दिया है...!!!

तुम्हारी आँखों में , मौन /मूक आँखों में...
सन्देश नहीं थे,
संकेत नहीं थे....
मैंने आश्वासन पढ़ लिया......!!!
सहसा बोलती तुम्हारी आँखों ने,
विषाक्त अधरों के विश्फुरण ने ,
चौंका दिया....
और मन रो दिया...!
...............आज फिर महसूस हुआ की तुम्हे खो दिया है...!