Monday, May 16, 2011

वो रात को बोलती थी...अक्सर

जैसे बौराए आम से कोयल कूकती है...!

और बात करते खिल खिल जाती थी..

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

यकीन मानो उसके पास जादू की पुडिया थी...

और जादू की दुनिया थी...

जहा वो मुझे छोड़ आती थी ....आने वाले कई दिनों के लिए

और कई रातो के लिए.

जैसे माँ देती थी बेहोशी की दवाई ..

बुखार की रातो में ....!

नहीं पर उसने नहीं दी ठंडी पट्टिया...

और शायद जागी भी नहीं कभी सुबह तक...!

फिर भी...

उसकी बातो में कुछ अलग अहसास था...

वो जून की दोपहर में ठन्डे तरबूजे बेचती थी...

और बेचते बेचते खिल खिल जाती थी...

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

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