मैं छोड़ता हु यह संघर्ष..
नहीं घुटने नहीं टेक रहा
पर तुम्हारी इस दुनिया में ..
जहा तुम धरम के नाम पर क्या क्या नही बेचते हो...
और जाति के नाम पे क्या क्या कचरते हो...
तुम्हरी उस दुनिया में तुम्हारी ही दी धरती पर से
मैं संघर्ष नहीं करना चाहता..और
घुटने टेकने के लिए भी तुम्हरी जमीन गवारा नहीं मुझे.
मैं चलता हु...
मुझे थोड़ी सी अपनी जमीन चाहिए थी....
पैर रखने को..और थोड़ी आसमान सर के ऊपर..
जमीन और आसमान जिन्हें मैं अपना कह सकू..
मुझे रोटी चाहिए...जीने का संबल चाहिए...
तुम उपदेश मत दो..की जीने के लिए सही रास्ते अपनाऊ...
मुझे मरने तक का सही ढंग नहीं दे रहे सब
और जीने के सही रास्ते दिखलाते हो जब मुझे रोटी चाहिए...??
मुझे नहीं लड़ना तुम्हरी इस दुनिया में...!
तुम्हारे हर कदम में सियासत की बू आती है...
और मुझे तुम्हारे इस पूरे आडम्बर से घिन है....
तुम्हारे घिस चुके वादों की पोटली जलाकर सोचता हु ताप लू...
कडकडाती रात में हडियो को एक सहारा तो होगा...
हाँ पर मेरी ताबूत में आखिरी कील मारने से पहले ये सुन लो...
जिस दिन मुझे मेरी जमीन मिल गयी
और मैं लड़ने निकल पड़ा...सुनो तुम्हारा पूरा ढोल बिखेर दूंगा...
मुझे इन्तेज्ज़र है अपनी जमीन का.
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