कल रात बहुत बारिश हुयी...तूफ़ान सा था कुछ खेतो की फसल
...ओलों से लहुलुहान हो गयी है
और मेरी आँखों में एक उम्मीद बची है की शायद अब भी कुछ उपज जाए...
काश की तूफ़ान ने उम्मीद भी तोड़ दी होती
अनाज से भरे बखार का स्वप्न तिरोहित हो गया है
मेरे छुप छुप पलते खिलखिलाते सपनो को
बारिश की एक रात लील सी जा रही है
पर ये नामुराद उम्मीद फिर भी लौट लौटआती है
शायद इस फसल को काटने के लिए दिहारी मजदूर तक ना आये
मैं जानता हु नहीं आयेंगे
इस जनाजे को मुझे ही उठाना है...निपट अकेले
पर ये सब कुछ लुट जाने में भी कुछ की उम्मीद क्यों बाकी है?
...काश की तूफ़ान ने "कुछ" भी तोड़ दिया होता
सब कुछ के साथ.
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