Saturday, May 28, 2011

ऐसे आती है तुम्हारी याद..

जैसे बीहड़ में कोई ब्र्हम्दाकिनी जलाती है ...

आग ....!

और कोई सुरजा या पेटला देख लेता है...

और किस्से होते है हर गाँव...

ब्रह्म्दाकिनी के और यह भी की...

सुरजा कितना झूठ बोलता है...

और पेटला कैसे पिछली गर्मी में मिर्गी खाता रहता था.

मैं किसी बच्चे सा

सुनता रहता हु...

और तुम्हारी याद ब्रह्मदाकिनी की डर सा चिपकी रहती है मेरे साथ...

हर जगह हर वक़्त..!

कई बार इन रास्तो से गुजरते हुए मोड़ के पत्थर बोलते है...

तुम्हारा नाम.

और भी, कोई कहानी..!

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