Saturday, May 28, 2011

यह जो अभी उबल आया,

पार हीराकुंड के निकल आया,

क्षण भर पहले कहा था?

बस धुआं था.

तुम जो बरसाती चाँदनी,

फूल पर, बाग़ पर,

सुर्ख लाल गुलाब पर,

क्या तुम्हारा अनुराग था?

चाँद में दाग था...!

टिमटिमाता रहा दिया,रात भर,

एक तुम्हारे आने की आस भर,

किसने सूरज जला दिया?

तुमने दिया भुला दिया.

अश्क कभी छुपा न सको,

गर मुझे भुला न सको,

बस इनती सी बात भर?

लौट आना मोड़ पर.

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