मेरे सामने दूर तक हरे पेड़ है...
पीपल के नीम के...आम के और ना जाने किस किसके
चिड़िया पूछ घुमा घुमा के फुदक रही है...
मानो जानना चाहती हो की पूछ है की नहीं...
देखना चाहती हो...पूछ का अश्तित्व ....!
अस्तित्व की जांच एक बेहद कठिन प्रक्रिया है...
और यह जांचना की आप हो और आप ही हो और भी कठिन.
हर बेढंग चीज़ के तरह नज़र इस सूखे पेड़ पे अटकी पड़ी है...
जैसे भूखे की निगाह रोटियों पे..............!
गौर तलब यह भी है की रोटी भी बेढंगी चीज़ है...
पर यह मामला बहस का है और विचारधारा का है....
हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं.....
मुझे तो वास्ता इस सूखे पेड़ से है....और फुदकती चिड़िया से है...!
सोचता हु एक ऐसी जगह चुनु जहा इस सूखे पेड़ की चुप हो...
हरियाली का अभिसार न हो....
चुप हो सूखे पेड़ का हो....
हाँ पर चिड़िया हो ..फुदकती हुयी...
क्युकी अस्तित्व की जांच बहुत जरूरी है...
आप हो और आप ही हो...यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है.
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