रातें महाजन के उधार सी हो गयी है ...
चुकती ही नही,
नींदें बांस के फूल सी..
निठुरवा लौटता ही नहीं.
किस बिदेस हो तुम???
नहीं ली इस बार नयी चूड़ियाँ...
खन खन बोलता रहता था .
लड़ बैठी हू, रूठी पड़ी हू...
निठुरवा मनाता भी नहीं.
मुझसे ऐसा परहेज!!!
निठुरवा टुकुर टुकुर ताकता रहता है,
मुंडेर से,
खिड़की से(जिअसे पहली बार देखा था)
मोढ़े पे बैठा कनखी से...
निठुरवा पर बोलता नहीं...
ऐसा चुप ऐसा चुप...
निठुरवा बोलता क्यों नहीं?
निठुरवा हवा के झोके सा आता है,
ठीक उसी वक़्त ...
जब पीपल के सारे पत्ते चुप होते है..
ठीक उसी वक़्त
जब उख के खेत में ,
स्यार हुआ हुआ चिल्लाते है..
पापी, निर्मोही..!
निठुरवा कुए से बाल्टी भर भर
बासी यादें निकालता है..
रे नुनु ...
बडकी सयान हो गयी है..
गैया बूढी ...
निठुरवा लौटता क्यों नही ?
ये कैसा बिदेस ?
मुझसे कैसा परहेज?
No comments:
Post a Comment