Monday, May 30, 2011

आज फिर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है,
कि आज फिर आंसुओं ने कर दी है हड़ताल...
सहस ही बन उठे है तूफ़ान ...
मैं जानता हु कि हमारे बीच दूरियाँ
सागार सा हैं, अपरिमित, अनंत..
और यह भी नहीं पता कि उस पार तुम हो भी या नहीं..


लेकिन इस ज्वार का क्या?
मुझसे ही करता रहता है विद्रोह...!!!
तनिक,
दम लेते ही टूट पड़ता है महिशाशुरी आक्रोश के साथ...


मैं भूल नहीं पाया अभी तक
एक दिन जो तुम्हारे आँखों ने मुस्कुरा कुछ पूछा था
और मैं जमीन में ढूंढ रहा था कुछ, यु ही,
मैं कंकर पत्थर चुन रहा था
अतीत अब भी घाव सा उभरता है...
और हाँ दुखता भी है....
कुछ दोहरा सकते हम...एक बार फिर से!!!
तुम मुझे चाह नहीं सकते
हम तुम पा नहीं सकते मगर
एक बार फिर से दोहराते हैं
सब कुछ,तुन्हारे होटों कि खिचती हुयी रेखाएं,
मेरा झुकता हुआ सर,
और इधर उधर होती हुयी नजरे
सब कुछ दोहराते हैं...
कि मैं नहीं चाहता कि आंसुओ को विद्रोह करना पड़े
मैं लौटना छठा हु उन अकेली रातों में...
जिन में किसी गन्धर्व कन्या सा गाते रहते थे
मेरे खामोश आंसू...
तुम आओ तोह सही सागर के उस पार से....

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