Sunday, January 13, 2013

तिल संक्रांति की सुबह।


एक कोस टहल कर, बाबा धुप में सुस्ताते होंगे,
खांस खांस कर, धीरे धीरे, इश्वर अल्लाह गाते होंगे!
नहा  सुना कर, बाबूजी मेरे,चुडा दही खाते होंगे,
गोभी वाली सब्जीबनाते , माँ पक्का झुंझलाती होगी।
उसको याद मेरी जो आती होगी!

दूरा पर तिल का घूरा जलाकर, पडोसी बतियाते होंगे,
पॉलिटिक्स की बातें कर चिल्लाते होंगे , समझाते होंगे।
अनपढ़ माँ मेरी, जो समझदार बहुत है, चिढ़ती होगी,
सुबह सुबह क्यों सब पगलाए है? कहती होगी।
उसको याद मेरी जो आती होगी।

उस पार वाले खेत में गेहूं  लहकता होगा,
और पीछे वाले खेतो में सरसों महकती होगी!
भैया को तिल शक्कर देकर, कर्जदार बनाते,
माँ छोटके की बाते कर कर , रोती होगी!
उसको याद मेरी जो आती होगी!

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