Tuesday, May 31, 2011

मैं छोड़ता हु यह संघर्ष..
नहीं घुटने नहीं टेक रहा
पर तुम्हारी इस दुनिया में ..
जहा तुम धरम के नाम पर क्या क्या नही बेचते हो...
और जाति के नाम पे क्या क्या कचरते हो...
तुम्हरी उस दुनिया में तुम्हारी ही दी धरती पर से
मैं संघर्ष नहीं करना चाहता..और
घुटने टेकने के लिए भी तुम्हरी जमीन गवारा नहीं मुझे.
मैं चलता हु...
मुझे थोड़ी सी अपनी जमीन चाहिए थी....
पैर रखने को..और थोड़ी आसमान सर के ऊपर..
जमीन और आसमान जिन्हें मैं अपना कह सकू..
मुझे रोटी चाहिए...जीने का संबल चाहिए...
तुम उपदेश मत दो..की जीने के लिए सही रास्ते अपनाऊ...
मुझे मरने तक का सही ढंग नहीं दे रहे सब
और जीने के सही रास्ते दिखलाते हो जब मुझे रोटी चाहिए...??
मुझे नहीं लड़ना तुम्हरी इस दुनिया में...!
तुम्हारे हर कदम में सियासत की बू आती है...
और मुझे तुम्हारे इस पूरे आडम्बर से घिन है....
तुम्हारे घिस चुके वादों की पोटली जलाकर सोचता हु ताप लू...
कडकडाती रात में हडियो को एक सहारा तो होगा...
हाँ पर मेरी ताबूत में आखिरी कील मारने से पहले ये सुन लो...
जिस दिन मुझे मेरी जमीन मिल गयी
और मैं लड़ने निकल पड़ा...सुनो तुम्हारा पूरा ढोल बिखेर दूंगा...
मुझे इन्तेज्ज़र है अपनी जमीन का.

Monday, May 30, 2011

आज फिर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है,
कि आज फिर आंसुओं ने कर दी है हड़ताल...
सहस ही बन उठे है तूफ़ान ...
मैं जानता हु कि हमारे बीच दूरियाँ
सागार सा हैं, अपरिमित, अनंत..
और यह भी नहीं पता कि उस पार तुम हो भी या नहीं..


लेकिन इस ज्वार का क्या?
मुझसे ही करता रहता है विद्रोह...!!!
तनिक,
दम लेते ही टूट पड़ता है महिशाशुरी आक्रोश के साथ...


मैं भूल नहीं पाया अभी तक
एक दिन जो तुम्हारे आँखों ने मुस्कुरा कुछ पूछा था
और मैं जमीन में ढूंढ रहा था कुछ, यु ही,
मैं कंकर पत्थर चुन रहा था
अतीत अब भी घाव सा उभरता है...
और हाँ दुखता भी है....
कुछ दोहरा सकते हम...एक बार फिर से!!!
तुम मुझे चाह नहीं सकते
हम तुम पा नहीं सकते मगर
एक बार फिर से दोहराते हैं
सब कुछ,तुन्हारे होटों कि खिचती हुयी रेखाएं,
मेरा झुकता हुआ सर,
और इधर उधर होती हुयी नजरे
सब कुछ दोहराते हैं...
कि मैं नहीं चाहता कि आंसुओ को विद्रोह करना पड़े
मैं लौटना छठा हु उन अकेली रातों में...
जिन में किसी गन्धर्व कन्या सा गाते रहते थे
मेरे खामोश आंसू...
तुम आओ तोह सही सागर के उस पार से....
उसकी चाहत की अजीब रस्मे तो देख
मुझे भी न देख,उसे भी न देख,

मुझे चाहना उसके बस का नहीं,कहती है
मेरी बातों में प्यार की मौशिकी न देख

वो मेरे रकीबो से मिलती है सज धज कर,
कहती है इसमें तू कोई आवारगी न देख.

मैं उसका ना रहा तो उसके दुआओं ने सदा दी,
तू मेरा हो के मर जा,कोई और जिंदगी न देख.

Saturday, May 28, 2011

काश तुम अपनी भरी दुनिया में से मुझे कुछ दे पाते...

बदला ही सही..

मैं ?मेरी तो दुनिया ही तुम्हरी है...!

काश की तुम दे पाते मुझे एक एहसास जो कभी मैंने किया नहीं...

और जिसे मैंने कभी जिया नहीं...!

अभी नीम की पत्तिया झड चुकी है...

और उन पर आ गए है सफ़ेद सफ़ेद छोटे छोटे फूलो के गुछे...

पर ठीक इसी वक़्त ऐसा क्यों है कि..

लाल फूलो वाला पेड़ उदास है...

कोई पत्ता तक नहीं!!!!!!!

काश कि तुम उसे कुछ पत्ते दे देते...!

पत्ते जो इस मौसम में उसे हमेशा छोड़ देते है...

तुम मेरी कविताएं नहीं समझ पाओगे...

मैं खुद भी नहीं समझ नहीं पाता...

काश कि तुम उन बच्चो को दे पाते कुछ साहस और कुछ सम्मान...

जिन्हें मैंने कल भी डांटकर भगा दिया...

जब वो रोती सूरत लेकर मुझे दुआ दे रहे थे..

मैं क्या दू? मेरी तो सारी दुनिया ही तुम्हारी है...!!!

मैंने उनको दिए सपने...उनको थोथापण लगा...!

काश कि तुम तैरना जानते...या कि मेरी होती टाँगे...

और हम दो किनारे न होते...!

एक धार होते ....

हिमालय से लेकर सिन्धु तक बहने वाली

एक धार.

ऐसे आती है तुम्हारी याद..

जैसे बीहड़ में कोई ब्र्हम्दाकिनी जलाती है ...

आग ....!

और कोई सुरजा या पेटला देख लेता है...

और किस्से होते है हर गाँव...

ब्रह्म्दाकिनी के और यह भी की...

सुरजा कितना झूठ बोलता है...

और पेटला कैसे पिछली गर्मी में मिर्गी खाता रहता था.

मैं किसी बच्चे सा

सुनता रहता हु...

और तुम्हारी याद ब्रह्मदाकिनी की डर सा चिपकी रहती है मेरे साथ...

हर जगह हर वक़्त..!

कई बार इन रास्तो से गुजरते हुए मोड़ के पत्थर बोलते है...

तुम्हारा नाम.

और भी, कोई कहानी..!

मेरे सामने दूर तक हरे पेड़ है...

पीपल के नीम के...आम के और ना जाने किस किसके

चिड़िया पूछ घुमा घुमा के फुदक रही है...

मानो जानना चाहती हो की पूछ है की नहीं...

देखना चाहती हो...पूछ का अश्तित्व ....!

अस्तित्व की जांच एक बेहद कठिन प्रक्रिया है...

और यह जांचना की आप हो और आप ही हो और भी कठिन.

हर बेढंग चीज़ के तरह नज़र इस सूखे पेड़ पे अटकी पड़ी है...

जैसे भूखे की निगाह रोटियों पे..............!

गौर तलब यह भी है की रोटी भी बेढंगी चीज़ है...

पर यह मामला बहस का है और विचारधारा का है....

हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं.....

मुझे तो वास्ता इस सूखे पेड़ से है....और फुदकती चिड़िया से है...!

सोचता हु एक ऐसी जगह चुनु जहा इस सूखे पेड़ की चुप हो...

हरियाली का अभिसार न हो....

चुप हो सूखे पेड़ का हो....

हाँ पर चिड़िया हो ..फुदकती हुयी...

क्युकी अस्तित्व की जांच बहुत जरूरी है...

आप हो और आप ही हो...यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है.

सुनो

बहाने दो मुझे आंसू,

आत्मा को पवित्र करती है ये निर्मल अश्रुधारा,

और हाँ जिस दिन मेरे आंसू रुक जाएँ

समझ लेना की मेरे भीतर का इंसान मर गया,

मेरे अन्दर इंसानियत ख़तम हो चुकी...

सुनो

उस दिन के बाद

मुझसे इंसानों सा मिलना..

वज़ह?एक जानवर को इंसान ही संभाल सकता है...

किन्तु एक सश्य है...

कि तुम्हारे अन्दर का इंसान तो कब मर चुका!

निश्चय ही

हम और तुम आमने सामने होगे...

उस दिन जिस दिन मेरे आंसू रुक जायेंगे..

सुनो.

टूटे हुए खवाब के शोशे यूँ चुभते है...

जैसे किसी पुराने गहरे घाव का निशाँ दिखाई देता है...

और एक धुंधली सी कहानी उभरती है.

धुंधले नाम, धुंधले चेहरे और धुंधली स्मृतियाँ..!

बारहा आँखों में आंसू बन उतर आता है,

वो बरसाती नदी सा यकायक चढ़ आता है

यु तो चुप रहता है,जहा रहता है,दिल में,

जब आता है तो ,बादल सा,घुमड़ घुमड़ आता है,

यह जो अभी उबल आया,

पार हीराकुंड के निकल आया,

क्षण भर पहले कहा था?

बस धुआं था.

तुम जो बरसाती चाँदनी,

फूल पर, बाग़ पर,

सुर्ख लाल गुलाब पर,

क्या तुम्हारा अनुराग था?

चाँद में दाग था...!

टिमटिमाता रहा दिया,रात भर,

एक तुम्हारे आने की आस भर,

किसने सूरज जला दिया?

तुमने दिया भुला दिया.

अश्क कभी छुपा न सको,

गर मुझे भुला न सको,

बस इनती सी बात भर?

लौट आना मोड़ पर.

Monday, May 16, 2011

वो रात को बोलती थी...अक्सर

जैसे बौराए आम से कोयल कूकती है...!

और बात करते खिल खिल जाती थी..

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!

यकीन मानो उसके पास जादू की पुडिया थी...

और जादू की दुनिया थी...

जहा वो मुझे छोड़ आती थी ....आने वाले कई दिनों के लिए

और कई रातो के लिए.

जैसे माँ देती थी बेहोशी की दवाई ..

बुखार की रातो में ....!

नहीं पर उसने नहीं दी ठंडी पट्टिया...

और शायद जागी भी नहीं कभी सुबह तक...!

फिर भी...

उसकी बातो में कुछ अलग अहसास था...

वो जून की दोपहर में ठन्डे तरबूजे बेचती थी...

और बेचते बेचते खिल खिल जाती थी...

जैसे सर्दियों में गुलाब खिलते है...!