Thursday, March 27, 2014

नेताजी गाँव आ रहे है,
लगता है फिर चुनाव आ रहे है!
फिर देश का विकास होने वाला है,
हर घर में पानी और प्रकाश होने वाला है, 
पाँच साल धूप थी, फिर छान्व आ रहे है,
लगता है फिर चुनाव आ रहे है!
जंग से हालात है, लोग खेमों में बँट रहे है,
उनके लबो पे भाई चारा है, जिनके हाथो में लट्ठ रहे है!
इनसान कि सोच में बदलाव आ रहे है!!!
लगता है फिर चुनाव आ रहे है!

Friday, February 21, 2014

उसने पैसो सा चाह मुझे,
पैसा सा सराहा मुझे,
तिल तिल  कर कमाया,
ईमान से बेईमानी से, सच से झूठ से,
हर तरह से कमाया,
और फिर बहा दिया,
शराब में जुए में दवा  दारू में,
अपने लिए !

मंदिरों में चढ़ाता रहा,
खुद को खुश  करने के लिए,
उसने पैसो सा चाहा मुझे,
यत्नों से, प्रयत्नों से, साजिशो से,
पाया मुझको,
ख्वाबो के लिए, सपनो के लिए, अपनों के लिए
बचाया   मुझको,
खुद से भी बढ़कर चाहा मुझे, 
खुद की संतुष्टि के लिए 
बूँद बूँद संजयो मुझको 
किसी और इस्तेमाल के लिए!

उसने पैसो सा चाहा मुझको!


अट्टहास सम तेरा स्मित, 
मौनव्रती मेरी आँखों का ज्वार 
तुमको अपना कह पाता,
कब ही था  इतना अधिकार?
मैं चिर  विरह का  आग्रही 
दुःख का स्नेही परिजन,
प्रिये कभी तो सुन जाओ 
हां इस हृदय की क्रंदन 
यह अनोखा चीत्कार,
मर्म भेदता रहता है मेरा 
मैं  निरुपाय मृगछौना 
हिंसक चीते सा समरण तेरा!

उनके सपने बड़े थे मैं आदमी छोटा निकला,
मैंने पत्थर  समझा वो सचमुच का खुदा  निकला,
अभी  बारीकी से वो मेरी रूह में है शामिल,
उसको छूकर मेरे नथुनों से हवा का झोंका निकला 
आना जाना लगा रहता है, दर्द क्यों हो?
पर उसकी गली से निकला तो आज टूटा निकला।
उसके अभिमान की हनक है वो मुझे तोड़ेगा,
मेरे सपनो में वो ही मेरा आइना निकला 
 चीखती ख़ामोशी तेरी और चुपचाप  मेरे आंसू,
पर्वतो से उतरती शाम से, घहराते उदास मेरे आंसू,

हु एक अभिसार किये मैं बड़ा पत्थर दिल,
मुझे परवाह नहीं दुनिया की, और मेरे खिलाफ  मेरे आंसू 

मैं न चाहू कोई रिश्ता तुझसे,ये सही की नाउमीद भी हु,
पर ये कातरता, उफ़! आखिरी प्रयास मेरे आंसू!

रौनकें तेरे पास तूने पाया इश्क में ये, तू कलंदर था,
मैं तो बस आशिक था, मेरे पास? मेरे आंसू!


प्यार गठबंधन की सरकार सा रहा तेरा मेरा,
विचारधाराओ से परे,
महज स्वार्थ पर आधारित।
दाव पेंचो से भरा, 
विपक्ष के सामने डगमगाता 
और एक दुसरे पे दवाब बनाता।

मीडिया सा रहा, 
व्यावसायिकता की पराकाष्ठा 
व्यक्तिवाद का अनुयायी,
नए नए मानदंड बनाता  हुआ,
नित नवीन प्रतिमान गढ़ता हुआ, अपने हिसाब से!

साहित्यकारों सा लापरवाह,
न मानने की जिद, 
वाद और परम्पराव में बंटा 
अनेक्मत हर वक़्त, 
ख्यालो के संसार में प्यार!


वैज्ञानिकों सा 
दुनिया से बेखबर,
सिर्फ अपने आप में 
अपनी धुन में,

ये तेरा मेरा प्यार 
बेहद अस्वाभाविक ढंग से स्वाभाविक 
हर प्यार की तरह,
हमेशा की तरह!

मैं नहीं हार सकता,
की मैं उम्मीद हु,
घुप्प अँधेरे में आशा की किरण!
मैं विश्वास हु किसी की श्रधा का,
भक्ति का।
बुढाती हुयी उन आँखों की जोत हु,
जो जानते है 
सपनो का सच झूठ!
हमेशा, खूबसूरत, अप्रयाप्य।

मैं बढ़ते  हुए चश्मे के नुम्बेरो में 
डूबती हुयी ज्योति में भी 
अटल आतामाविश्वास हु,
जो जानते है दुनिया को और पहचानते है संघर्ष को,
जद्दोजहद को,
करीब से, आत्मीय की तरह।

मुझे नहीं डूबना है तट परखड़े लोगो के लिए,
आस के लिए!
मुझे  लड़ते  रहना है!