Saturday, February 2, 2013

पेंडुलम, गोलगप्पे और सेब।

उन दिनों 
वो आम के मंजरो सा महकती , 
और मैं लाही सा चिपका रहता।

दूरियाँ पडोसी खेतो की मेड सी अक्सर मिट जाती ...
और फिर हम लोक लाज की बातें करने लगते।
उन दिनों उसे चोकलेट बहुत पसंद थे,
पर मैं उसके लिए सेब खरीदता।

उन दिनों 
मुस्कान उसके होठो से खेलती आती,
और वो उसे मुझे चिपका चली जाती।
और फिर मैं बहुत देर तक खेलता रहता 

उन दिनों 
मुझे नींद बहुत आती  और सपने बिलकुल भी नहीं।
हर बार मैं मेड टूटने के बाद कसमे खाता।

और किसी दिन फिर मेड टूट जाती ...
पडोसी खेतो के बीच से ......
स्वार्थ कब मानता है।
वो प्यार के दिन थे।

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