कसाई के हाथो में कटहल के कोमल कोमल पत्ते थे,
आह मेमने!तुम्हे कटहल के पत्ते वाले हाथों से डरना था!
मेमने का मन ललचाता था, बेचारा, पीछे पीछे आता था।
उछल उछल कर मारे ख़ुशी के मिम्याता था,
कटहल के पत्तो को संसार समझ पीछे पीछे आता था।
कसाई भी कर्मयोगी था, उसके छोटे प्यारे बच्चे थे,
मकान, दूकान दालान, सब उसके कच्चे थे,
गीता उसने पढ़ी नहीं पर सन्देश उसने पहचाना था,
फल की चिंता भी थी, और कर्म भी किये जाना था।
मेमने की उम्र मुलायम थी, समझ मुलायम
बस कटहल के पत्ते खाता था,पीछे पीछे आता था!
यो इतना भी अबोध नहीं था, मेमना कुत्तो से डरता था,
खतरे को भांप तुरत , भाग तुरंत भूसे में जा छुपता था।
भूख कसाई का सच थी, भूख तुम्हारा भी सपना था।
भूख कसाई का सच थी, भूख तुम्हारा भी सपना था।
कसाई का दोष नहीं, नियति तुम्हारी, तुमको तो कटना था,
कुत्तों से नही, छद्म स्नेह् फांस से बचना थाआह मेमने!तुम्हे कटहल के पत्ते वाले हाथों से डरना था!
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