Friday, February 22, 2013

भूख

कसाई के हाथो में कटहल के कोमल कोमल पत्ते थे,
मेमने का  मन ललचाता था, बेचारा, पीछे पीछे आता था।
उछल उछल कर मारे ख़ुशी के मिम्याता था, 
कटहल के पत्तो को संसार समझ पीछे पीछे आता था।
कसाई भी कर्मयोगी था, उसके छोटे प्यारे बच्चे थे,
मकान, दूकान दालान, सब उसके कच्चे  थे,
गीता उसने पढ़ी नहीं पर सन्देश उसने  पहचाना था,
फल की चिंता भी थी, और कर्म भी किये जाना था।
मेमने की उम्र मुलायम थी, समझ मुलायम 
बस कटहल के पत्ते खाता था,पीछे  पीछे आता था!
यो इतना भी अबोध नहीं था, मेमना कुत्तो से डरता था, 
खतरे को भांप तुरत , भाग तुरंत भूसे में जा छुपता था।
भूख कसाई का सच थी, भूख तुम्हारा भी सपना था।
कसाई का दोष नहीं, नियति तुम्हारी, तुमको तो कटना  था,
कुत्तों से नही, छद्म स्नेह् फांस से बचना था
आह मेमने!तुम्हे कटहल के पत्ते वाले हाथों से डरना था!





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