Monday, February 25, 2013

मैं काफ़िर हु, तू खुदा  न बन, 
मेरी जमीन बन, मेरा आसमान न बन,
इश्क की इतनी कदर कर ले मेरे,
तू किसी का न बन, गर मेरा न बन!
जब तुमने रच ये खेल ,
तो नियम भी बताने थे तुम्हे,
मुझे तो अब लगा है 
जब मैं बदहवास औंधा पड़ा हु,
और दर्शक तालिय पीट रहे है,
कि  यह सब खेल था!!!
चलो माना तुम जीते, 
पर नियम तो बताने थे!!!
तुम्हारे खेल के तुम्हारे कायदे!
देखो तुम्हारा कोई दोष नहीं, 
पर मुझे चोट नहीं लगती ,
मैं गिरता नहीं, 
अगर मुझे कायदे मालूम होते!
तुम भी खुदा  निकले 
 कठपुतली घुमाते सा  रहे!

Friday, February 22, 2013

भूख

कसाई के हाथो में कटहल के कोमल कोमल पत्ते थे,
मेमने का  मन ललचाता था, बेचारा, पीछे पीछे आता था।
उछल उछल कर मारे ख़ुशी के मिम्याता था, 
कटहल के पत्तो को संसार समझ पीछे पीछे आता था।
कसाई भी कर्मयोगी था, उसके छोटे प्यारे बच्चे थे,
मकान, दूकान दालान, सब उसके कच्चे  थे,
गीता उसने पढ़ी नहीं पर सन्देश उसने  पहचाना था,
फल की चिंता भी थी, और कर्म भी किये जाना था।
मेमने की उम्र मुलायम थी, समझ मुलायम 
बस कटहल के पत्ते खाता था,पीछे  पीछे आता था!
यो इतना भी अबोध नहीं था, मेमना कुत्तो से डरता था, 
खतरे को भांप तुरत , भाग तुरंत भूसे में जा छुपता था।
भूख कसाई का सच थी, भूख तुम्हारा भी सपना था।
कसाई का दोष नहीं, नियति तुम्हारी, तुमको तो कटना  था,
कुत्तों से नही, छद्म स्नेह् फांस से बचना था
आह मेमने!तुम्हे कटहल के पत्ते वाले हाथों से डरना था!





Saturday, February 2, 2013

पेंडुलम, गोलगप्पे और सेब।

उन दिनों 
वो आम के मंजरो सा महकती , 
और मैं लाही सा चिपका रहता।

दूरियाँ पडोसी खेतो की मेड सी अक्सर मिट जाती ...
और फिर हम लोक लाज की बातें करने लगते।
उन दिनों उसे चोकलेट बहुत पसंद थे,
पर मैं उसके लिए सेब खरीदता।

उन दिनों 
मुस्कान उसके होठो से खेलती आती,
और वो उसे मुझे चिपका चली जाती।
और फिर मैं बहुत देर तक खेलता रहता 

उन दिनों 
मुझे नींद बहुत आती  और सपने बिलकुल भी नहीं।
हर बार मैं मेड टूटने के बाद कसमे खाता।

और किसी दिन फिर मेड टूट जाती ...
पडोसी खेतो के बीच से ......
स्वार्थ कब मानता है।
वो प्यार के दिन थे।