मन रे चलो अब दूजो सराय,
बड़ी राह तकी,
घनी रात भयी,
सजन रहो कही बिसराय....
मन रे चलो अब दूजो सराय ....!!!
आंखन में धधक धधक नीर बुझे...!
अब बहुतही अकेले पीर सहे,
इक उमर हमारी आसन बीती ....
अब रहो मन अकुलाय!!!
मन रे चलो अब दूजो सराय!
एक बात हमारी बस समझ न आई,
तुमने क्यों झूठी आस दिलाई...?
क्यों मीठी बात बनायीं...?
तुम रहो कहा नुकाय?
मन रे चलो अब दूजो सराय...!!!
Monday, February 13, 2012
Monday, February 6, 2012
मुझे झूठ में बहुत विश्वास है
सच इतना अकेला और असहाय था
मुझे उसका भरोसा न हुआ,
यो लगा, वो भिखारी सा मुझसे पैसे मांगेगा,
भूख के नाम पर
और कोने में जा सिगरेट पिएगा.
यकीन मानिये मेरी एक अवधारणा है
भिखारियों के लिए..और
मैं सैधांतिक तौर पर खिलाफ हु
भीख के, भिखारियों के...!!!
झूठ बड़े ठाट मैं आया...
रोब के साथ...मेरी आँखों में आँखे डाल बाते की..
उसके अनुययियो की भीड़ थी .......चारो तरफ
सबने नकाब पहन रखे थे,
और नकाब झूठ बोल रहे थे...
मैंने चढ़ावा दिया...और उनका आश्वाशन लिया...
मुझे झूठ और उसके आडम्बरो में बहुत विश्वास है.
ये बदल चुके है दुनिया.
मुझे उसका भरोसा न हुआ,
यो लगा, वो भिखारी सा मुझसे पैसे मांगेगा,
भूख के नाम पर
और कोने में जा सिगरेट पिएगा.
यकीन मानिये मेरी एक अवधारणा है
भिखारियों के लिए..और
मैं सैधांतिक तौर पर खिलाफ हु
भीख के, भिखारियों के...!!!
झूठ बड़े ठाट मैं आया...
रोब के साथ...मेरी आँखों में आँखे डाल बाते की..
उसके अनुययियो की भीड़ थी .......चारो तरफ
सबने नकाब पहन रखे थे,
और नकाब झूठ बोल रहे थे...
मैंने चढ़ावा दिया...और उनका आश्वाशन लिया...
मुझे झूठ और उसके आडम्बरो में बहुत विश्वास है.
ये बदल चुके है दुनिया.
मिर्गी के दौरे हर पल नहीं आते...!
उस रात जब रोशनी जयादा थी और अँधेरा कम ,
चकाचौंध इतनी की लोगो को नीद नहीं आ रही थी...
कुछ पागलो सा नाच रहे थे या फिर चिल्ला रहे थे...
मैं सपने देख रहा था...
तुम्हारी याद में.
या फिर उन भूतो के डर से आँखे बंद रखी थी ,
जो बचपन से अब तक
आये नहीं, पर डराया बहुत ....काले होते है वो!!
यकीन मानो नींद भी तुम्हारी तरह बदचलन है...!
मैंने जागते सपनो में तुम्हे कई रंगों में देखा...
खूबसूरत,
तुम किसी गाडी में बैठ कही अदेश जा रही थी...
अपता, अनोखी जगह....जहा घरो से जयादा दरवाजे है...
फिर भी कोई लौटता नहीं...!
कुछ शुभ चिंतको ने मेरे जिन्दा होने - रहने की संभावनाओं को टटोला...
और मेरे सलामती की खबर पाकर मायूस हुए शायद
किसी अख़बार वाले की तरह
जो जिन्दा जलते आदमी की फोटो लेने गया हो...
और उस आदमी को सिर्फ जिन्दा पाया हो..जलते नहीं...
मैं आपकी निराशा समझता हु...पर
साहब,
मिर्गी के दौरे हर पल नहीं आते...!
चकाचौंध इतनी की लोगो को नीद नहीं आ रही थी...
कुछ पागलो सा नाच रहे थे या फिर चिल्ला रहे थे...
मैं सपने देख रहा था...
तुम्हारी याद में.
या फिर उन भूतो के डर से आँखे बंद रखी थी ,
जो बचपन से अब तक
आये नहीं, पर डराया बहुत ....काले होते है वो!!
यकीन मानो नींद भी तुम्हारी तरह बदचलन है...!
मैंने जागते सपनो में तुम्हे कई रंगों में देखा...
खूबसूरत,
तुम किसी गाडी में बैठ कही अदेश जा रही थी...
अपता, अनोखी जगह....जहा घरो से जयादा दरवाजे है...
फिर भी कोई लौटता नहीं...!
कुछ शुभ चिंतको ने मेरे जिन्दा होने - रहने की संभावनाओं को टटोला...
और मेरे सलामती की खबर पाकर मायूस हुए शायद
किसी अख़बार वाले की तरह
जो जिन्दा जलते आदमी की फोटो लेने गया हो...
और उस आदमी को सिर्फ जिन्दा पाया हो..जलते नहीं...
मैं आपकी निराशा समझता हु...पर
साहब,
मिर्गी के दौरे हर पल नहीं आते...!
Sunday, February 5, 2012
अफीम
फिर आजकल राजनितिक रैलियों का रंग है,
तिरेंगे के रूमाल बन रहे है....
गाड़ियाँ सजाने का काम भी लेते है लोग इससे
अमूमन इन दिनों...!
लाल, केसरिया, तिरंगा, पीला...हर तरह का रंग...
इन्द्रधनुष बन रखे है गाँव...!!!
सदियों से गुलाम लोग चीख चीख गाने लगे है ...
अपने अपने राजाओ की स्तुतिगान ...
भजन गा रहे है
अपने अपने देवताओ के ,
गुलामी को फिर से आवाज मिली है..!
लोकतंत्र ...का महान नाटक अभिनीत होने जा रहा है,
हज़ारो हज़ार की तादाद में आये और कलाकारों का मानवर्धन करे!
लानत है....!
इन सब रंगों में गरीबी दिखी कही?
चार रोटिया तोड़ , किसी झोपड़ी में एक रात गुज़ार
लोग स्विस अकाउंट को और सेकयोर करते है...
हुह ...तुम इन्हें भगवान समझते हो...
ये अपने मंदिर बनाने लगे है...
लानत है!
और लानत है सबसे जयादा उन बापों पर...
जो डाल रहे है अपनी निरीह संतानों को इस अफीम की आदत,
ढाह दिए जाने चाहिए वो कंधे...
जो ले जाते है मासूमो को इन प्रवंचना के तमाशो में.
तिरेंगे के रूमाल बन रहे है....
गाड़ियाँ सजाने का काम भी लेते है लोग इससे
अमूमन इन दिनों...!
लाल, केसरिया, तिरंगा, पीला...हर तरह का रंग...
इन्द्रधनुष बन रखे है गाँव...!!!
सदियों से गुलाम लोग चीख चीख गाने लगे है ...
अपने अपने राजाओ की स्तुतिगान ...
भजन गा रहे है
अपने अपने देवताओ के ,
गुलामी को फिर से आवाज मिली है..!
लोकतंत्र ...का महान नाटक अभिनीत होने जा रहा है,
हज़ारो हज़ार की तादाद में आये और कलाकारों का मानवर्धन करे!
लानत है....!
इन सब रंगों में गरीबी दिखी कही?
चार रोटिया तोड़ , किसी झोपड़ी में एक रात गुज़ार
लोग स्विस अकाउंट को और सेकयोर करते है...
हुह ...तुम इन्हें भगवान समझते हो...
ये अपने मंदिर बनाने लगे है...
लानत है!
और लानत है सबसे जयादा उन बापों पर...
जो डाल रहे है अपनी निरीह संतानों को इस अफीम की आदत,
ढाह दिए जाने चाहिए वो कंधे...
जो ले जाते है मासूमो को इन प्रवंचना के तमाशो में.
Subscribe to:
Comments (Atom)