Tuesday, December 28, 2010

अभी सब कुछ चुप है,
और अभी चीख रही हो?
रात भर मैंने सूरज का इंतज़ार किया,
और ये इतना उदास क्यूँ है?
प्रयोजन? अक्सर ही पूछ लेती हो...
मेरे पास एक पिटारा है॥
निकालता रहता हूँ तरह तरह के खिलौने !
समझाना चाहता हु ,
उद्वेग कि यह भाषा
विकलता अक्सर आखो तक आकर ठहरती है ...!!!
जादूगरी है...!!!
रुको आखिरी संधान करें...
इस बार इस सांझ पहर में ,
सौदेबाजी ऐसी हो...
कि पूरी रात के इंतज़ार के बाद
सूरज उदास न हो...

और अहले सुबह तुम चीखा न करो.....!!!!

No comments:

Post a Comment