यह जो सर कटे
मुसाफिर देख रहे हो...
युद्ध में नहीं मारे गए किसी ये॥!
इनकी निर्लज्जता ने इनके सिरों को काटकर...
अपना घर बना लिया है-----------------
वर्षो तक चुप रहने की
आदि इनकी जुबान,
तंगी है कमर में पोलिस के,
और इनकी चमड़ी से बूट बन रहे है..!!!
Tuesday, December 28, 2010
हवाओ के संग ये खबर आई है,
ये वतन हमारा नहीं हम इस वतन के नहीं,
जहा के जर्रे जर्रे में हमारी रूह है शामिल,
वो घर हमारा नहीं, हम उस आँगन के नहीं॥
फिजा में ख़ामोशी हमने पसंद तोह ना थी मगर,
दुश्मन थे हम मातम के अमन के नहीं॥
मिलना हमसे तुम मगर अहसान सा न फिर कभी,
मुन्तजिर है मीठे बोल के रहम के नहीं॥
यह सलाम है आखिरी, लौटकर आये न फिर,
गुलाम तेरी रूह के है हम बदन के नहीं॥
अभी सब कुछ चुप है,
और अभी चीख रही हो?
रात भर मैंने सूरज का इंतज़ार किया,
और ये इतना उदास क्यूँ है?
प्रयोजन? अक्सर ही पूछ लेती हो...
मेरे पास एक पिटारा है॥
निकालता रहता हूँ तरह तरह के खिलौने !
समझाना चाहता हु ,
उद्वेग कि यह भाषा
विकलता अक्सर आखो तक आकर ठहरती है ...!!!
जादूगरी है...!!!
रुको आखिरी संधान करें...
इस बार इस सांझ पहर में ,
सौदेबाजी ऐसी हो...
कि पूरी रात के इंतज़ार के बाद
सूरज उदास न हो...
और अहले सुबह तुम चीखा न करो.....!!!!
और अभी चीख रही हो?
रात भर मैंने सूरज का इंतज़ार किया,
और ये इतना उदास क्यूँ है?
प्रयोजन? अक्सर ही पूछ लेती हो...
मेरे पास एक पिटारा है॥
निकालता रहता हूँ तरह तरह के खिलौने !
समझाना चाहता हु ,
उद्वेग कि यह भाषा
विकलता अक्सर आखो तक आकर ठहरती है ...!!!
जादूगरी है...!!!
रुको आखिरी संधान करें...
इस बार इस सांझ पहर में ,
सौदेबाजी ऐसी हो...
कि पूरी रात के इंतज़ार के बाद
सूरज उदास न हो...
और अहले सुबह तुम चीखा न करो.....!!!!
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